“सौतेली माँ” एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही हमारी आँखों के सामने कहानियों वाली सौतेली माँ आ जाती है।
जो बच्चे पर बहुत ज़ुल्म करती है, उसे तरह-तरह की यातनाएँ देती है और मारती-पीटती है।
लेकिन हकीकत हमेशा कहानियों जैसी नहीं होती।
सच तो यही है कि माँ तो सिर्फ माँ होती है—चाहे वह बच्चे को जन्म दे या उसकी ज़िम्मेदारी निभाए।
कई बार एक औरत किसी और के बच्चे को अपना समझकर प्यार भी देती है और ज़रूरत पड़ने पर उसे डाँट भी देती है।
एक माँ के दिल में उस बच्चे के लिए वही ममता और प्यार होता है, जो उसके अपने जन्मे बच्चे के लिए होता है।
सिर्फ कोख से बच्चा जन्म देने से कोई माँ नहीं बन जाती।
माँ बनने के लिए उस बच्चे के साथ रातें जागकर बितानी पड़ती हैं,
उसके दर्द को अपना दर्द समझकर महसूस करना पड़ता है।
“सौतेली” शब्द जुड़ जाने से क्या माँ की ममता खत्म हो जाती है?
यह भी सच है कि एक सौतेली माँ का प्यार दिखावे का नहीं, बल्कि सहनशीलता से भरा होता है।
वह हर बात सौ बार सोचकर करती है।
जहाँ एक माँ अपने जन्मे बच्चे को अधिकार से कुछ भी कह सकती है,
वहीं सौतेली माँ को हर शब्द तौलकर बोलना पड़ता है।
क्योंकि “सौतेली” शब्द के साथ समाज और रिश्तेदारों के ताने भी जुड़ जाते हैं।
लोगों को लगता है—
“यह तो सौतेली है, फर्क तो करेगी ही।”
यही समाज की घटिया सोच एक माँ को भीतर से तोड़ देती है।
जबकि सच्चाई यह है कि एक माँ कभी बच्चों में फर्क नहीं करती।
फिर भी सौतेली माँ को बुरा समझा जाता है।
जिस तरह एक माँ अपने जन्मे बच्चे के अच्छे भविष्य की चिंता करती है,
उसी तरह वह दूसरे बच्चे के लिए भी उतनी ही फिक्रमंद होती है।
तो फिर सवाल यह है कि हम माँपन को हमेशा खून से ही क्यों तौलते हैं?
माँ तो कुर्बानी से भी बनती है।
जो हर रोज़ खुद को भूलकर किसी और के जन्मे बच्चे की ज़िंदगी सँवार दे—
वही असली माँ होती है।
यह लेख उन सभी सौतेली माँओं के लिए है,
जो खुद को भूलकर, समाज के ताने सहकर,
किसी और की संतान के लिए माँ बनकर जीती हैं।
यह लेख उन बच्चों के लिए भी है,
जो समझते हैं कि उनकी माँ उनसे फर्क करती है—
शायद वह माँ खामोशी से आपके लिए लड़ रही हो।
क्योंकि माँ होना कोई रिश्ता नहीं—
यह एक कुर्बानी है।

