हर चुनाव से पहले मंचों पर एक ही वादा गूंजता है —
“नशा खत्म करेंगे, युवाओं को रोजगार देंगे, पंजाब को फिर से खड़ा करेंगे।”
लेकिन चुनावी भाषणों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी आज भी वैसी ही क्यों है?
आख़िर क्यों डिग्रियां हाथ में लेकर खड़ा युवा, भविष्य की योजनाएँ बनाने की बजाय नशे की गिरफ्त में फिसलता जा रहा है?
क्या यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी है —
या फिर राजनीतिक वादों की असफलता और सिस्टम की लगातार अनदेखी का परिणाम?
राजनीति, गैंगवार और नशे का गठजोड़
कई घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि गैंगवार और अवैध कारोबार की जड़ें सतही नहीं, बल्कि बेहद गहरी हैं। सवाल केवल अपराधियों का नहीं, उस तंत्र का है जो उन्हें पनपने देता है।
युवाओं को आगे कर, पीछे से आखिर कौन सी ताकतें काम कर रही हैं?
क्या वे सिर्फ मोहरे हैं, या किसी बड़े खेल का हिस्सा?
जनता सब जानती है — पर बोलती क्यों नहीं?
क्या डर है, या विश्वास ही खत्म हो चुका है?
क्या राजनीति और अपराध के बीच की रेखा उतनी साफ है, जितनी मंचों से दिखाई जाती है?
अगर गैंग सक्रिय हैं, तो संरक्षण किसका है?
कार्रवाई की घोषणाओं के बावजूद नेटवर्क क्यों नहीं टूटता?
हर बड़ी वारदात के बाद कुछ दिनों का शोर, मीडिया डिबेट और कड़ी निंदा…
फिर वही सन्नाटा क्यों?
क्या यह सन्नाटा ही सबसे बड़ा संकेत नहीं?
पढ़ी-लिखी पीढ़ी क्यों भटक रही है?
यह वही पीढ़ी है, जिसे “देश का भविष्य” कहा जाता है।
लेकिन बेरोजगारी, अवसरों की कमी और असुरक्षित माहौल के बीच यही भविष्य आज असमंजस में खड़ा है।
डिग्रियाँ हैं, सपने हैं, क्षमता है —
फिर भी रास्ते धुंधले क्यों हैं?
जब सिस्टम भरोसा नहीं दे पाता, तो युवा किस पर भरोसा करे?
जब राजनीति ठोस समाधान नहीं देती, तो यह निराशा किस दिशा में जाएगी?
क्या यही कारण है कि नौजवान पीढ़ी गलत आकर्षणों की ओर खिंचती जा रही है?
या फिर यह भी एक ऐसा वातावरण है, जहाँ सवाल पूछने वाली पीढ़ी उलझी रहे, बिखरी रहे और संगठित न हो सके?
क्या यह केवल सामाजिक विफलता है —
या कहीं न कहीं यह स्थिति सुविधाजनक भी है?
निष्कर्ष
यह मुद्दा किसी एक दल, एक नेता या एक परिवार तक सीमित नहीं है।
हर पाँच साल बाद सत्ता बदलती है, नए वादे किए जाते हैं, जनता को भरोसा दिलाया जाता है कि अब बदलाव होगा।
लेकिन नतीजा बार-बार वही क्यों रह जाता है?
नौजवान पीढ़ी अब भी नशे की गिरफ्त में क्यों दिखाई देती है?
क्या समस्या केवल सरकार बदलने से हल होगी,
या पूरे ढांचे की जवाबदेही तय करनी होगी?
यह केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं,
यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी — तीनों की परीक्षा है।
सवाल सीधा है —
क्या हम सच में नशा खत्म करना चाहते हैं?
या यह मुद्दा हर चुनाव में उठेगा, सुर्खियाँ बनाएगा और फिर अगली रैली तक भुला दिया जाएगा?
क्योंकि अगर देश का भविष्य ही खो रहा है,
तो चुप्पी भी एक तरह की साझेदारी मानी जाएगी।

