आज के समय के अनुसार इज़त का पैमाना बदल चुका है ।
आज कल इज़त को संस्कारों से नहीं ,
बल्कि
बैंक बैलेंस से मापा जाता है।
वो कहते है न,
“जिस के पास पैसा ,उस की गलतियाँ भी मजबूरी,
और
“जिस के पास पैसा नहीं, उस की मजबूरी भी गुनाह”।
मुझे आज भी याद है ,मेरी मां हमेशा मुझसे कहा करती थी के बेटा ,
पैसा कम हो तो चल जाए गा ,
पर संस्कार पूरे होने चाहिए।
पर आज के समय में यह सब उल्टा है ।
पैसे का घमंड हमेशा इज़त पर भारी होता हैं।
क्योंकि आज हमें किसी को कितनी इज़त देनी है ,यह सब बैंक बैलेंस पर निर्भर करता है ।
अगर किसी के पास लाखों है तो हम उस को अपना बाप भी बनना लेंगे ,
पर
अगर उस के पास कुछ नहीं है तो हम अपने पिता को पहचानने से भी इनकार कर देंगे ।
पर इज़त को पैसे के घमंड से तोला नहीं जा सकता ।
इज़त वही होती है।
यहां इंसान को इंसान समझा जाए । न के पैसे को भगवान।
यहां गरीब को आवाज को भी उतना ही अहम माना जाए ,जितना अमीर की आवाज को ।
पैसा जरूरत है ,
इज़त नहीं ।
और इज़त हक है ,
किसी पैसे की मोहताज नहीं ।
जिस दिन समाज यह फर्क समझ गया ,
उस दिन खामोश आवाजें भी बोलना शुरू कर देंगी ।

