“घर,समाज और रिश्ते “यह तीनों चीजें एक रिश्तों को संभालने के लिए बहुत एहम माने जाते है। कहा जाता है के यह तीनों चीजें एक औरत का संसार होती है ।
पर कई बार सच्चाई बिल्कुल सोच जैसी नहीं होती।कई बार यह तीनों चीजें मिल कर एक औरत की आवाज भी छीन लेते है।इस के बाद जो बचता है ,वह है एक गहरी “खामोशी” । जो बाहर से तो शांति लगती है । पर भीतर से एक तूफान, एक चीख होती हैं। जो हर पल भीतर ही भीतर गूंजती रहती है।
यह खामोशी एक दिन से शुरू नहीं होती ,सब से पहले यह घर से शुरू होती है । यहां कहा जाता है –
“कम बोलो ,धीरे बोलो ,यही संस्कार होते है ।
फिर यही चुप्पी शादी के बाद घर की जरूरत बन जाती है ।
यहां कहा जाता है –
“हम इस को कुछ भी बोले ,कुछ भी कहे,पर यह उल्टा हमें जवाब न दे ।
ओर अगर कुछ बुरा लग भी जाए तो अपने घर, परिवार को ना बताए।
वहां उस से अपेक्षा की जाती है के यह पूरे परिवार को संभाले और सब को खुश रखें। पर इस स्थिति में उस को सुनने वाला या समझने वाला कोई नहीं होता।
एक औरत जो शादी के बाद पूरे घर को संभालती है ,सब की जिम्मेवारियां उठाती है । पर इस पूरे परिवार में उसी को संभालने वाला कोई नहीं होता।
अगर फिर भी कभी वो सब कुछ संभालती- संभालती थक जाए जो जवाब मिलता है “यह तो हर औरत करती है “तुम कौन सा कुछ अनोखा कर रही हो।
अगर वो दर्द में होती है, तो जवाब मिलता है “समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाए गा”
और
अगर वो गलती से कोई जवाब दे दे,तो सब की उंगल उस की तरफ उठने लगती है ।
“कहते है इस को अकल ही नहीं है ,इस को घर संभालना ही नहीं आता ,इस को यह नहीं पता के इस की चुप्पी घर की शांति के लिए जरूरी है ”
फिर यही चुप्पी उस औरत की जिंदगी में एक खास जगह ले लेती है ।
जिसे हम “खामोशी” कहते है। उस के भीतर बहुत सारी बातें होती है ,पर उस को सुनने ओर समझने वाला कोई नहीं होता ,उस के अंदर यह तूफान एक गूंज की तरह उठती है ,जिसे वो किसी को नहीं बता सकती ।
यह खामोशी कोई कमजोरी नहीं होती ,
– यह रिश्तों को बचाने के लिए
– अपने परिवार की इज़त के ख्याल से
– या फिर अपने बच्चों के भविष्य के लिए भी होती है ।
बस बात यह है के यहां औरत को चुप्पी को सहनशीलता समझ लिया जाता है । उस की खामोशी को संस्कारों का नाम दे दिया जाता है ।
पर सच तो यह होता है के वह औरत भीतर से पूरी तरह टूट गई होती है । बिखर गई होती है।
बस जरूरत होती है उस औरत की खामोशी को समझने की ,उस को जानने की ।

