1947 के अपराधियों को सज़ा नहीं मिली,
और 2026 में सज़ा देने के लिए
अपराधी ही नहीं मिल रहे।
कभी सुना है ऐसा?
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चलिए, आपको बताते हैं।
1947 का बंटवारा सिर्फ़ ज़मीन का नहीं था—
वो इंसानियत, भरोसे और इंसाफ़ का भी बंटवारा था।
ट्रेनें लाशों से भरकर आईं,
गलियाँ खून से रंगीं,
औरतों की इज़्ज़त लूटी गई,
बच्चे अनाथ हो गए—
लेकिन सवाल तब भी खड़ा था
और आज भी है:
किसे सज़ा मिली? किसे इंसाफ़ मिला?
आज तक किसी को यह तक नहीं पता
कि उस दौर में
किस हथियार से,
किसने,
किसके आदेश पर क़त्लेआम किया।
हत्यारे भीड़ में छिप गए,
और पीड़ित इतिहास के पन्नों में दबा दिए गए।
न कोई FIR,
न कोई अदालत,
न कोई सुनवाई,
न कोई सज़ा—
बस “हालात” कहकर
सच को दफना दिया गया।
और उन हालातों को पैदा करने वाले
अपराधी आज भी गुमनाम हैं।
यहीं से एक खतरनाक परंपरा ने जन्म लिया—
बड़े अपराध, बिना इंसाफ़।
1947 का बंटवारा
सिख क़ौम के लिए
जड़ से उजड़ जाने का साल था।
पश्चिम पंजाब की वो धरती,
जहाँ गुरुओं के चरण पड़े थे,
जहाँ पीढ़ियों से बसे घर थे—
एक झटके में छीन ली गई।
हज़ारों सिख सिर्फ़ इसलिए मारे गए
क्योंकि उनकी पहचान अलग थी।
काफ़िले लूट लिए गए,
गाँव के गाँव जला दिए गए,
और ट्रेनें
सिखों की लाशों से भरकर आईं।
औरतों पर ज़ुल्म हुआ,
और बच्चों को
तलवारों की छाया में बड़ा होना पड़ा।
लेकिन उन अपराधों का हिसाब
किसी अदालत ने कभी नहीं माँगा।
यह जुर्म यहीं नहीं रुका।
जब सिखों ने अन्याय के आगे
झुकना मंज़ूर नहीं किया,
तो सत्ता ने अपनी क्रूरता दिखाते हुए
सिखों की आस्था पर ही वार किया—
श्री हरमंदिर साहिब पर।
और संविधान?
वो तब भी चुप रहा।
सरकारें बनती रहीं,
सीमाएँ खींची जाती रहीं,
संविधान के मसौदे तैयार होते रहे—
लेकिन सिखों के ज़ख़्मों पर
न मरहम लगा,
न इंसाफ़ मिला।
अपराध “दंगों” के नाम पर दर्ज हुए,
और अपराधी
इतिहास की भीड़ में खो गए।
यहीं से सिखों ने एक कड़वा सच सीख लिया—
बलिदान की क़द्र इतिहास करता है,
लेकिन इंसाफ़ की उम्मीद
सिस्टम से करना बेकार है।
आज 2026 में भी
तस्वीर बहुत ज़्यादा नहीं बदली।
आज भी जब पीड़ित थाने जाता है,
तो पहले उसकी औक़ात पूछी जाती है।
FIR से पहले पहचान,
इंसाफ़ से पहले पहुँच—
और अगर सामने वाला ताक़तवर हो,
तो कानून खुद पीछे हट जाता है।
आज की पुलिस–न्याय व्यवस्था में
कानून नहीं, “सहमति” चलती है—
गरीब के लिए धाराएँ,
अमीर के लिए दलीलें।
सच बोलने वाला गवाह डर जाता है,
केस सालों तक लटकते रहते हैं,
और इंसाफ़
तारीख़ों के बोझ तले
दम तोड़ देता है।
तब भी कानून था,
आज भी कानून है—
लेकिन सिखों के लिए
इंसाफ़ तब भी अधूरा था,
और आज भी अधूरा है।

